राजहरा की छूट चुकी खबरें जो अखबारों में नही मिलती

Rajhara

दल्ली राजहरा दो अलग अलग नामों से मिलकर बना नाम है, दल्ली और राजहरा। पहले बात करते है दल्ली की- स्थानीय बोली में दल्ली का अर्थ दलदल होता है कहीं-कहीं इसे लद्दी भी कहा जाता है। अब जानते है कि दल्ली नाम क्यों पड़ा? दल्ली राजहरा में दो बड़े पहाड़ व छोटी-छोटी कुछ पहाड़ियां है। कुछ वर्षो पूर्व जब इन पहाड़ों में लौह खनिज का उत्खनन प्रारंभ नही हुआ था तो यहां के पहाड़ों में कई छोटे बड़े झरने हुआ करते थे और झरने के पानी के गिरने से वहां आसपास दलदल हुआ करती थी। झरने से बने दलदल के कारण यह स्थान झरना दल्ली कहलाते हुए झरनदल्ली कहलाने लगा। आज भी पुराने लोग दल्ली राजहरा को झरनदल्ली कहकर पुकारते है। इसी झरनदल्ली से निकला हुआ शब्द दल्ली है।
राजहरा का नाम यहां पर प्रसिद्ध राजहरा बाबा मंदिर से पड़ा, राजहरा बाबा का वास्तविक नाम राजाराव बाबा है। अब आप बार-बार राजाराव पुकारिये राजाराव, राजहरा में परिवर्तित होने लगता है, अर्थात राजाराव का अपभ्रन्श राजहरा है। इस तरह झरनदल्ली से दल्ली व राजाराव से राजहरा, दोनो को मिलाकर दल्ली राजहरा कहलाया। भिलाई इस्पात संयंत्र ने भी दल्ली राजहरा स्थित पहाड़ों का नाम राजहरा पहाड़ व दल्ली पहाड़ रखा है। अधिकतर लोगों का कहना है कि दल्ली व राजहरा पहाड़ के कारण यहां का नाम दल्ली राजहरा पड़ा है।

दल्ली राजहरा की पहाड़ियों में लौह अयस्क की खोज भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के प्रमथ नाथ बोस ने की थी। सन 1887 में हुई इस खोज के बाद से टाटा कंपनी के जमशेदजी टाटा की दल्ली राजहरा के प्रति रूचि बढ़ गई तभी से उन्होने तत्कालीन डौण्डीलोहारा ज़मींदारी के संपूर्ण क्षेत्र में दोबारा कंपनी के वैज्ञानिकों द्वारा सर्वेक्षण अनुज्ञप्ति प्राप्त कर जांच की व सन 1905 में ब्रिटिश शासन से लायसेंस प्राप्त कर सर्वेक्षण करवाया गया जिससे दल्ली राजहरा, महामाया, दुलकी, डोन्‍गरबोर, कोण्डे, कोकान एवं कच्चे की पहाडियां शामिल है। दो वर्षों तक चले इस सर्वेक्षण में यहां अथाह लौह अयस्क के भंडार की पुष्टि हुई। सन 1907 में अनजाने कारणों से टाटा कंपनी ने अपनी इस परियोजना को बीच में ही बंद करवा तत्कालीन बिहार में स्टील प्लांट प्रारंभ किया। सर्वेक्षण में लौह अयस्क भंडार की पुष्टि के बाद सोवियत रूस से हुए समझौते के तहत भिलाई में संयंत्र की स्थापना कर दल्ली राजहरा, कच्चे, दुलकी व महामाया माईंस से लौह अयस्क का खनन प्रारंभ हुआ, जो आज पर्यन्त जारी है।

पुराने जमाने में आज के जैसे अत्याधुनिक उपकरणों की खोज नही हो पाई थी जिससे भू-वैज्ञानिकों को धरती के अंदर समाए खनिज भण्डार का पता लगाने साधारण सी युक्ति का प्रयोग किया जाता था जैसे कि जिस स्थान पर पहाड़ों पर साल (सरई) के वृक्षों का बहुतायत में पाया जाना व स्थानीय जनजाति द्वारा लोहारी काम किया जाना। इसी प्रकार की भौगोलिक जानकारी मिलने के बाद ही भू-वैज्ञानिकों के दल इस प्रकार का सर्वेक्षण करते थे।

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