राजहरा की छूट चुकी खबरें जो अखबारों में नही मिलती

    ब्रम्ह रचयित ब्रम्हाण्ड में अनेक ग्रह, उपग्रह, तारे, पिण्ड, उल्काएं, धूमकेतु आदि ईश्वर की स्तुति में लीन है| मानवीय ज्ञान के आधार पर पृथ्वी सारे ग्रहों में सबसे सुंदर ग्रह है जो आज तक के वैज्ञानिक विश्लेषण एवं अनुसंधान से भी सिद्ध हो चुका है जहां जीवन की विविधताएं समाहित हैं|
पृथ्वी पर सर्वोच्च बुद्धिमान जीव मनुष्य ही है, पर ये क्या! सारे आंकड़ो व परिणामों से पता चलता है कि बुद्धिमान नही महामूरख व लालची है, जो मुर्गी का पेट चीरकर सारे अंडे एक साथ निकाल लेना चाहता है| आदिम युग से ही जब मनुष्य ने आग का इस्तेमाल सीखा, औज़ार बनाए यानि कि उसे विज्ञान का ज्ञान हुआ| ज्यों ज्यों ज्ञान बढ़ा मनुष्य प्रगति करने लगा| धन, वैभव, ऐश्वर्य, सुख एवं समृद्धि की चाहत में वह दानव रूप धर लिया| उसकी ललचाई आंखे प्रकृति के बहुमूल्य संसाधनो पर पड़ी फिर क्या था प्राकृतिक संसाधनों के व्यापार से उनका अंधाधुन्ध दोहन होने लगा जो आज पर्यन्त जारी है| साथ ही साथ नवीनतम वैज्ञानिक अविष्कार जो मनुष्य जीवन को सरलीकृत कर रहें है विनाश का पर्याय बनते चले गए|
आज आम आदमी भी प्रकृति के खजाने को लूट रहा है, इस लूट के छोटे-छोटे उदाहरण हमें रोज़ाना देखने को मिलते है| व्यर्थ पेट्रोल, डीजल, गैस, बिजली व पानी की बर्बादी| कोई भी पूरी ईमानदारी से नही कह सकता है कि मैने पर्यावरण को बर्बाद नही किया है|
पर्यावरण शब्द पढ़ने में शायद थोड़ा कठिन लगे पर है बड़ा आसान सा जो हमारे चारो ओर हैं, हमें ज़िंदा रखे हुए है| इसी की देन हमारे फेफड़ो में आक्सीजन बन घुलती है| हमारी नसों में हीमोग्लोबीन बनकर दौड़ती है और हृदय स्पंदित होता है| भविष्य की भयावहता हमें अपने ही आसपास दिखाई पड़ती है, कई स्थानो पर जन्में बच्चो में शारीरिक एवं मानसिक विकृति देखने को मिल रही है| यही प्रकृति का प्रकोप है|
हमारी सरकारें भी कड़े कानून नही बनाती| कानून बनने पर कड़ाई से पालन नही होता| पर्याव‍रण संरक्षण हेतु अनेक योजनाएं बनती है पर उनका सही क्रियान्वयन शायद ही हो पाता है संबंधित विभाग भी असहाय दिखते है| वन  क्षेत्र लगातार सिमटते जा रहे है| विकास हेतु विनाश अपनी चरम सीमा पर है| कुछेक ही प्रकृति प्रेमी पर्यावरण हितैषी कार्य में लगे हुए है जिनकी संख्या काफी कम है|
हमेशा से ही पौधारोपण अभियान को आशातीत सफलता नही मिल पाती, जिसका कारण सतत निगरानी का अभाव है| मौक़े पर जाकर कार्यो का निरीक्षण नही किया जाता फलस्वरूप रोपे गए पौधे सूखकर दम तोड़ देते है| देश में जब से वन अधिकार पत्र वितरित किया जा रहा है वन क्षेत्रो में अतिक्रमण की बाढ़ सी आ गई है| स्थानीय स्तर पर मौजूद अमला अतिक्रमण रोकने में असमर्थ है| मुख्यालय में सिमटकर रह गए उच्चाधिकारियों की वजह से वृक्षों की कटाई धड़ल्ले से जारी है| छोटे लकड़ी चोर साल भर बीतते ही जंगल माफिया बन जाते है| सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार भी पर्यावरण की दुर्दशा का सिद्ध आरोपी है दूसरी ओर भारत के वन आच्‍छादित क्षेत्रो में पनप रहे नक्सलवादी भी अपने कार्यक्रमों में सड़क किनारे के निर्दोष पेड़ों की बलि लेकर हरित रक्त बहाते है| हर बार सैकड़ो पेड़ मार्ग अवरूद्ध करने के लिए काटकर गिराए जाते है|
उद्योगों एवं खदानों को शासन की स्वीकृति महज कुछ शर्तो पर मिल जाती है पर क्या उद्योग अपने संस्थापन के एवज में कटे असंख्य पेड़ो व उनसे हुए पर्यावरणीय क्षति की भरपाई महज पौधारोपण करने से कर सकेंगे जो हास्यास्पद है| ज़रूरत है आज जंगल बचाने मुहिम छेड़ने की, जड़े जमाए विशाल वृक्षों को कटने से बचाने की| जैसे चिपको आंदोलन में हुआ था, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है लोगों ने पेड़ कटने से बचने के लिए इन्हे अपने सगो की तरह सीने से लगा लिया था|
आओ दम घुटे इससे पहले ताजी हवा का जुगाड़ कर लें| अपने आसपास कटते पेड़ो को बचाए, पहले आग्रह करें| न माने तो वन विभाग, तहसीलदार व थाने में लिखित शिकायत कर रिपोर्ट दर्ज कराएं| नियमानुसार कलेक्टर की स्वीकृति बगैर जीवित वृक्ष नही काटे जा सकते| आओ अपने परि-आवरण को सहेजें, अपने जन्मदिन पर एक पेड़ जरूर लगाएं|

>>> फ़िरोज़ अहमद ख़ान

(सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति, बंगाली क्लब स्मारिका से साभार)

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